October 31, 2020

नेहरु नहीं तो किसने बनाई खड़गपुर की IIT

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, खड़गपुर भारत सरकार द्बारा 1951 में स्थापित इंजीनियरिंग और प्रौद्योगिकी -उन्मुख एक स्वायत्त उच्च शिक्षा संस्थान है। सात आईआईटी में यह सबसे पुरानी है। भारत सरकार ने इसे आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय महत्त्व का संस्थान माना है और इसकी गणना भारत के सर्वोत्तम इंजीनियरिंग संस्थानों में होती है। आई आई टी खड़गपुर को विभिन्न इंजीनियरिंग शिक्षा सर्वेक्षणों जैसे कि इंडिया टुडे और आउटलुक में सर्वोच्च इंजीनियरिंग कॉलेजों में से एक का स्थान दिया गया है।
2100 एकड़ 8.5 वर्ग किमी
1947 में भारत की स्वाधीनता के बाद आई आई टी खड़गपुर की स्थापना उच्च कोटि के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों को प्रसिक्षित करने के लिए हुई थी। इसका संस्थागत ढांचा दूसरी IITओं की ही तरह है और इसकी प्रवेश की विधि भी बाकी IITओं के साथ ही होती है। आई आई टी खड़गपुर के छात्रों को अनौपचारिक तौर पर केजीपिअन् कहा जाता है। सभी IITओं में इसका कैम्पस क्षेत्रफल सबसे ज्यादा है[2] और साथ ही विभाग और छात्रों की संख्या भी सर्वाधिक है। आई आई टी खड़गपुर, इल्लुमिनेशन, रंगोली, क्षितिज और स्प्रिन्ग्फेस्ट जैसे अपने वार्षिक उत्सवों के कारण जाना जाता है।
भारत में युद्धोपरांत औद्योगिक विकास हेतु उच्चतर तकनीकी संस्थानों कि स्थापना के लिए दो भारतीय शिक्षाविदों हुमायूँ कबीर और जोगेंद्र सिंह ने 1946 में तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बिधान चन्द्र रॉय की मदद से एक कमेटी का गठन किया। इसके बाद नलिनी रंजन सरकार कि अगुवाई में 22सदस्यीय एक कमिटी का गठन हुआ। अपने अंतरिम रिपोर्ट में कमिटी में देश के विभिन्न भागों में मैसाचुसेट्स प्रौद्योगिकी संस्थान (MIT) की तर्ज़ पर सम्बद्ध दूसरे दर्जे के संस्थानों के साथ उच्चतर तकनीकी संस्थानों कि स्थापना का प्रस्ताव रखा। रिपोर्ट में देश के चार भागों में प्रमुख संस्थानों कि जल्द स्थापना के लिए कार्य आरंभ करने पर जोर दिया गया,।
साथ ही यह भी कहा गया कि पूर्व और पश्चिम में संस्थानों की स्थापना तुरंत होनी चाहिए। उस वक़्त पश्चिम बंगाल में उद्योगों के सर्वाधिक केन्द्रीकरण की दलील देते हुए बिधान चन्द्र रॉय ने भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इस बात के लिए राज़ी कर लिया कि पहले संस्थान की स्थापना पश्चिम बंगाल में ही हो। इस प्रकार पहले भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कि स्थापना मई 1950 में “Eastern Higher Technical Institute” के नाम से हुई। .[3] आरम्भ में संस्थान कोलकाता के पूर्वी एस्प्लेनेड में स्थित था और सितमबर 1950 में अपने स्थायी कैम्पस कोलकाता से 120 किमी दक्षिण पूर्व में हिजली, खड़गपुर में विस्थापित किया गया। जब अगस्त 1951 में पहला सत्र आरम्भ हुआ, तब संस्थान में 224 छात्र और 10 विभागों में 42 शिक्षक थे। सारी कक्षाएं, प्रयोगशालाएं और प्रशासनिक कार्यालय ऐतिहासिक हिजली कारावास शिविर अर्थात शहीद भवन के नाम से जाना जाने वाला में स्थित थे जहाँ कि अंग्रेजी शासन काल में राजनितिक क्रांतिकारियों को बंदी बना कर रखा जाता था और प्राण दंड दिया जाता था। इस कार्यालय के भवन में ही द्वितीय विश्व युद्ध के वक़्त का मुख्यालय भी था।18 अगस्त 1951 को मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के द्वारा औपचारिक उद्घाटन से पूर्व “भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान” का नाम ग्रहण किया गया था। 15 सितम्बर 1956 को भारतीय संसद ने “भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर अधिनियम” पारित कर दिया जिसके तहत संस्थान को “राष्ट्रीय महत्व के संस्थान” का दर्जा मिला। 1956 में प्रधानमंत्री नेहरु ने संस्थान के पहले दीक्षांत अभिभाषण में कहा था ऐतिहासिक हिजली बंदी ग्रह जो भारत के बेहतरीन स्मारकों में से एक है अब भारत के नये भविष्य के रूप में बदल रहा है। यह चित्र मुझे उन परिवर्तनों का आभास कराता है जो कि भारत में हो रहे हैं। ”
जिसके बाद शहीद भवन को 1990में एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया। [5]श्रीनिवास रामानुजन् परिसर को एक नए शैक्षणिक परिसर के तौर पर शामिल किया गया जहाँ तक्षशिला ने 2001 और विक्रमशिला ने 2002 में काम करना प्रारंभ किया।

प्रिया झा

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